Tuesday, May 5, 2009

समाचार-पत्रों में बढ़ता भाषायी खेल

वर्तमान युग सूचना क्रान्ति का युग है। इस युग में दुनिया सिमटकर छोटी हो गई है। पूंजीवाद, भूमंडलीकरण और बाजारवाद आधुनिक युग के कुछ ऐसे पहलू हैं, जिन्होंने समाज के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित किया है। यदि यह कहा जाए कि समाचार-पत्र इनके प्रभाव से अछूते रह गए हैं तो यह अनुचित होगा।
भूमंडलीकरण ने समाज में प्रत्येक चीज़ को बाज़ार में प्रवेश करा दिया है जहाँ सभी प्रतिस्पर्धा की होड़ में लगे हुए हैं। समाचार-पत्र भी बाज़ार में प्रवेश कर चुके हैं। यही कारण है कि सभी समाचार-पत्र, बाज़ार में अपना ऊँचा स्थान बनाने के लिए भाषायी खेल का सहारा ले रहे हैं। तथा समाचार-पत्रों की भाषा के वास्तविक स्वरूप को अनदेखा कर एक नई भाषा गढ़ रहे हैं जो सही मायने में समाचार-पत्रों की भाषा न होकर बाज़ार की चकाचौंध भरी जिंदगी में जीने का एक मंत्र है।
खेल...। खेल तो कई प्रकार के होते हैं, परंतु शायद ही किसी ने सोचा होगा कि भाषा भी कभी खेल बन जाएगी। हालांकि वर्तमान युग में भाषायी खेल कोई नई बात नहीं रह गई है, फिर भी यह जब-तब भाषायी शुद्धतावादियों के हृदय को कचोटती रहती है। आखिर अपनी मातृभाषा हिन्दी के साथ खेल होता कौन देख सकता है। आश्चर्य की बात तो यह है कि यह खेल, समाचार चैनलों में तो दिखाई देता ही है साथ ही समाचार-पत्रों में भी इसके दर्शन होने दुर्लभ नहीं रह गए हैं। आज प्रत्येक समाचार-पत्र अपने को बेहतर और आकर्षक बनाने में लगा हुआ है तथा ऐसी रोचक और चटपटी भाषा का प्रयोग करता है जो जनसाधारण को रुचिकर लगे। मीडिया की भाषा का एक प्रमुख गुण उसका जनसाधारण होना है। समाज में कोड-मिश्रण की प्रवृत्ति प्रचुरता से प्रयुक्त हो रही है। समाचार-पत्रों में भी इसका दिखना आश्चर्यजनक नहीं है क्योंकि समाचार-पत्र भी तो समाज का व्यक्ति ही लिखता है। परंतु इस तरह के प्रयोग हिंग्रेजी का साम्राज्य स्थापित कर रहे हैं। उदाहरणार्थ -
इसके बावजूद ‘व्हिस्पर कैम्पेनिग' में शुरू से मायावती को बढ़त मिली हुई थी। (दैनिक जागरण 12 मई, 2007, पृष्ठ-1) राइट ने इयान चैपल को रॉन्ग बताया।( संडे नवभारत टाइम्स, 1 अप्रैल, 2007, पृष्ठ-14) इस तरह के कोड-मिश्रण के उदाहरण समाचार-पत्रों में यत्र-तत्र देखने को मिल जाते हैं। यहाँ देखा जाए तो भाषा की वाक्य-संरचना में तो कोई विकार नहीं आया, परंतु ‘व्हिस्पर कैम्पेनिग' और ‘रॉन्ग’ शब्द जिनके लिए हिन्दी में विभिन्न शब्द उपलब्ध हैं, उन हिन्दी शब्दों को छोड़कर अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करना सही है क्या? अपने इस दोष को छिपाने के लिए वे ये तर्क भी नहीं दे सकते जो आमतौर पर समाचार चैनलों द्वारा दिया जाता है कि समय की कमी की वजह से समाचार-लेखक को जो ध्यान में आता है, वे वही लिख देता है। समाचार-लेखक द्वारा किए जाने वाले इन प्रयोगों का प्रमुख कारण युगीन प्रवृत्ति है। जिसमें हिन्दी को ‘डाउनमार्केट’ और अंग्रेजी को ‘अपमार्केट’ समझ लेने की भ्रान्ति उत्पन्न हो गई है। जिसका समाज में पूरे शोरों पर चलन है। चलो...यदि इस तरह के प्रयोग हो रहे हैं तो इनके सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं पर दृष्टि डालने में कोई हर्ज नहीं है। यथा -ला - ला, डिप्सी, टिंकी विकी और पो तुसी ग्रेट हो!(हिन्दुस्तान, 8 अप्रैल, 2007, हम-तुम, पृष्ठ-5)गिलक्रिस्ट के शतक से रनों का एवरेस्ट (दैनिक जागरण, 29 अप्रैल, 2007, पृष्ठ-15)
यही तो है भाषा का खेल। जिसने समाचार-पत्रों की भाषा को रोचकता एवं आकर्षकता प्रदान की है। यहाँ प्रथम उदाहरण में हिन्दी, अंग्रेजी और पंजाबी का मिश्रण समाचार के शीर्षक को आकर्षक बना देता है। वहीं दूसरे उदाहरण में ‘एवरेस्ट’ का प्रयोग सार्थक है जो अपने अंदर बहुत से रनों के भाव को समेटे है। परंतु इसके स्थान पर ‘पहाड़ या पर्वत’ शब्द भी सही होता। इस तरह के प्रयोग तो कोड-मिश्रण की पृवत्ति के कारण स्वीकार किए जा सकते हैं परंतु समाचार-पत्रों में अंग्रेजी शब्दों का ऐसा प्रयोग भी देखने को मिल जाता है जिससे अस्पष्टता तो आती ही है, साथ ही कभी-कभी तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है। यथा -
कान में बॉलीवुड सितारों का मेला (हिन्दुस्तान, 18 मई, 2007, पृष्ठ- 14)टेस्टी बनाना बॉल्स (हिन्दुस्तान, 18 अप्रैल, 2007, मैट्रो रीमिक्स, पृष्ठ-2) पहले उदाहरण में ‘कान’ शब्द में अंग्रेजी आगत शब्द ‘ऑ’ का शुद्ध प्रयोग न करने से शीर्षक में अस्पष्टता आ गई है। यह ‘कान’ कोई शरीर का अंग नहीं है बल्कि ‘कॉन फिल्म समारोह’ की अभिव्यंजना के लिए इसे प्रयुक्त किया गया है। दूसरे उदाहरण में ऐसा ज्ञात होता है कि ‘बनाना’ क्रिया है, परन्तु यह क्रिया न होकर ‘केला’ (फल) अर्थात् संज्ञा है जिसका अंग्रेजी प्रयोग, अर्थ में अस्पष्टता उत्पन्न करता है। इससे पूरा वाक्य ही अस्पष्ट लगने लगता है। इस उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि हर खेल के कुछ नियम होते हैं, चाहे वह भाषायी खेल ही क्यों न हो। अतः इन्हें खेलते समय नियमों को लागू करना अतिआवश्यक है, नहीं तो इसके कोई मायने नहीं रह जाते। समाचार-पत्रों के भाषायी खेल के कुछ आकर्षक पहलू भी हैं जो पाठक को समाचार पढ़ने के लिए आकर्षित करते हैं। यथा -
वीरू चले, युवराज चले, दादा चले, चले सचिन रे।(;राष्ट्रीय सहारा, 20 मार्च, 2007 पृष्ठ-1)लागा ताज के हुस्न में दाग, छुड़ाए कैसे...(नवभारत टाइम्स, 15 मई, 2007, पृष्ठ 1) किसी आवश्यक एवं गंभीर विषय को भी इस तरह से रोचक बनाकर प्रस्तुत कर पाठक को इन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाता है। दिन-रात की भागमभाग के बीच पाठक जब कुछ पढ़ने के लिए उठाता है तो उसका मन ज्ञान के साथ-साथ मनोरंजन प्राप्त करने का भी रहता है। तथा इस तरह के प्रयोग यह दोनों कार्य करने में समर्थ होते हैं। परंतु इनकी अतिशयता कभी-कभी पाठक में ऊब को उत्पन्न कर देती है। भाषा के इस खेल में अन्य खेलों की भांति बुद्धि के प्रयोग का भी अवकाश होता है। ऐसे प्रयोग अपने भीतर कई अर्थ समेटे होते हैं। यथा - और अभि की हो गई ऐश ( हिन्दुस्तान, 21 अप्रैल, 2007, पृष्ठ - 1)
इस उदाहरण के दो अर्थ निकलते हैं। एक अर्थ है कि ऐश्वर्या अभिषेक की हो गई अर्थात् अभिषेक का विवाह ऐश्वर्या से हो गया तथा दूसरा अर्थ है कि अभिषेक की ऐश हो गई अर्थात् अभिषेक के ऐश्वर्या से विवाह होने के कारण मजे हो गए। अतः इस प्रकार के प्रयोग पाठक को विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं। ठीक उसी तरह, जिस प्रकार खेल ;वीडियो गेम, शतरंज आदि में किसी पड़ाव को पार करने के लिए करना होता है। वर्तमान युग में विज्ञापनों का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि ये मीडिया के विभिन्न माध्यमों की जिंदगी की साँसे बनते जा रहे हैं। इनका प्रभाव इतना बढ़ गया है कि समाचार-पत्रों की भाषा में भी इसकी छाप दृष्टिगोचर होने लगी है। उदाहरणार्थ -
डंडे की डंडे। हर किस्म और साइज के डंडे। यदि आप सोच रहे हों कि डंडे के इस फंडे के पीछे मतलब मारपीट से है, तो भूल जाइये। साहब ये डंडे तो चुनावी प्रचार के सबसे बड़े हथियार हैं। (हिन्दुस्तान, 27 मार्च, 2007, हिन्दुस्तान-गाजियाबाद, पृष्ठ -1)
इस उदाहरण में चुनावों के दौरान प्रयुक्त किए जाने वाले डण्डों का इस प्रकर उल्लेख किया है कि ऐसा लगता है कि डण्डों के विक्रय के लिए विज्ञापन प्रस्तुत किया जा रहा है। पाठक का मनोरंजन करने तथा समाचार को आकर्षक बनाने के लिए किए जाने वाले इस भाषायी खेल को देखकर यह संदेह उत्पन्न होने लगता है कि कहीं आगे आने वाली पीढ़ी को इसी रूप में ही समाचार पढ़ने को न मिलने लगे। यदि ऐसा हुआ तो लोग वास्तविक समाचार के स्वरूप को भूल जाएंगे तथा हमारी भावी पीढ़ी इसके वास्तविक स्वरूप को जान ही नहीं पाएगी। समाचार-पत्रों की भाषा में परिवर्तन का मुख्य कारण समाचारों के विषयों में आया परिवर्तन है। बॉलीवुड की फिल्मों की मुंबइया भाषा का प्रयोग भी समाचार-पत्रों में देखने को मिल ही जाता है। उदाहरणार्थ -
एनकाउंटर...। बोले तो यूपी पुलिस के लिए प्रमोशन पाने का शार्टकट तरीका. (हिन्दुस्तान, 25 अप्रैल, 2007, पृष्ठ 14) इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है कि बाज़ार में अपना स्थान बनाने के लिए समाचार-लेखक समाचार को गुण्डों, मवालियों की भाषा में भी प्रस्तुत करने में नहीं हिचकते। ऐसी भाषा जहाँ समाचार-पत्रों के भाषायी खेल को प्रकट करती है वहीं पुलिसककर्मियों के कार्यों पर भी व्यंग्य की सृष्टि करती है कि उत्तर प्रदेश के पुलिसकर्मी धोखाधडी, भ्रष्टाचार धनलोलुपता जैसी कुरीतियों से ग्रस्त तो हैं ही, साथ ही प्रसिद्दि तथा ऊँचा पद प्राप्त करने के लिए एनकाउंटर को एक सीढ़ी के रूप में प्रयोग करते हैं। इन प्रयोगों के अतिरिक्त समाचार-पत्रों में ऐसी भाषा भी प्रयुक्त होने लगी है जिसमें शब्द, क्रीडा करते प्रतीत होते हैं। तथा पाठक को आकर्षित करने के साथ-साथ भाषा में सजीवता एवं रोचकता भर देते हैं। ...कि फाईनल में उनका बल्ला बोलेगा। (जनसत्ता, 26 अप्रैल, 2007, पृष्ठ 12) रस्मों में उत्तर और दक्षिण भारतीय परम्पराओं का निर्वाह किया गया जिसमें बंगाली परम्पराओं की छौंक लगी . (हिन्दुस्तान, 21 अप्रैल, 2007, पृष्ठ - 14) यहाँ पहले उदाहरण में ‘बल्ले के बोलने’ तथा दूसरे उदाहरण में ‘परम्पराओं की छौंक लगने’ में भाषायी खेल दृष्टिगोचर होता है अन्यथा बल्ले से तो खेला जाता है तथा परम्पराएँ निभाई जाती हैं। यही तो है - समाचार-पत्र की भाषा का चमत्कार। अन्यथा प्रायः सब्जी में जीरे का छौंक लगाया जाता है। चूंकि यहाँ विवाह में उत्तर व दक्षिण भारतीय परम्पराओं के मिले जुले रूप का निर्वाह करने के साथ-साथ कुछ बंगाली परंपराओं का भी निर्वाह किया गया, इस बात को चुटकीला बनाने के लिए शब्द का सहप्रयोग विचलन किया गया है। व्यंग्यात्मक भाषा का प्रयोग करते हुए किसी अन्य स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्दों का प्रयोग किसी भिन्न स्थान पर कर देने से भाषा रोचक और अर्थ्गाभित बन जाती है। समाचार-पत्र में से इस प्रकार का उदाहरण द्रष्ट्व्य है - पहला बल्ला, मैदान / खेत है नजर में / इनकी भाई / रन की फसल को / टिड्डी चर गई, सबकी / शामत आई।(हिन्दुस्तान, 1 अप्रैल, 2007, पृष्ठ 11) यहाँ क्रिकेट संबंधी वस्तुओं और बातों की कृषि से समानता दिखाई गई है। दरअसल इसमें भारतीय खिलाड़ियों के विश्व कप में किए गए शर्मनाक प्रदर्शन पर एक बड़ा व्यंग्य छिपा है। रन न बना पाने के लिए टिड्डी के फसल चर जाने के प्रयोग से क्रिकेटरों के क्रिकेट में ध्यान न देकर विज्ञापन में लगे रहने की प्रवृत्ति का भी उदघाटन किया है। टिड्डी, उनकी क्रिकेट के प्रति एकाग्रता की विमुखता को प्रकट करती है। जिस प्रकार यदि किसान खेतों में फसल का ध्यान न रखे तो टिड्डी फसल खराब कर देती है। उसी प्रकार क्रिकेटरों द्वारा खेल में पूर्णतः ध्यान न लगाने के कारण वे अपना अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए। समाचार-पत्रों में होने वाले इस भाषायी खेल को देखकर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि वर्तमान युग में समाचार→एक उत्पाद, समाचार-लेखक→उत्पादकर्ता, समाचार-पत्र→ बाज़ार और पाठक→उपभोक्ता बन गए हैं। इस परिवर्तन ने समाचार-पत्र की हिन्दी भाषा में जहाँ एक ओर कई विकृतियाँ उत्पन्न की हैं, वहीं उसमें सजीवता, रोचकता-आकर्षकता का भी समावेश किया है। जिस प्रकार कमरे को आकर्षक बनाने के लिए सुंदर सामान की सजावट की जाती है उसी प्रकार भाषा को प्रभावशाली बनाने के लिए शब्दों की सजावट की जाती है। इस सजावट की प्रवृत्ति के कारण ही समाचार-पत्रों में भाषायी खेल देखने को मिलता है। समाचार-लेखक को इस भाषायी खेल में भाषा संबंधी दोषों से बचने तथा भाषायी खेल को नियमों के साथ खेलने का प्रयास करना चाहिए, नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब फिल्म , विज्ञापनों और समाचार-पत्रों की भाषा में कोई अंतर नहीं रह जाएगा।

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अदनान पर पत्नी ने मुकदमा ठोंका....


मुंबई। पाकिस्तानी गायक अदनान सामी और पत्नी सबा का विवाद एक बार फिर कानून की चौखट पर पहुंच गया है। सबा ने अदनान के खिलाफ प्रताड़ना, धोखाधड़ी और धन मांगने के आरोप में एक प्राथमिकी दर्ज कराई है। इन आरोपों में अदनान की गिरफ्तारी भी हो सकती है।
पुलिस ने मंगलवार को बताया कि अदनान को उनकी गिरफ्तारी से पहले 72 घंटे का नोटिस दिया गया है। इस दौरान वे अदालत से अग्रिम जमानत ले सकते हैं।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब 35 वर्षीय गायक के खिलाफ उनकी पत्नी ने कोई मामला दर्ज कराया हो। इससे पहले भी अदनान की पत्नी ने उनके खिलाफ असंज्ञेय अपराध के आरोप में शिकायत दर्ज कराई थी।
पुलिस उपायुक्त निकेत कौशिक ने कहा, 'पछली रात सबा ने ओशिवारा पुलिस थाने में एक प्राथमिकी दर्ज अदनान पर शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है। साथ ही कहा कि अदनान उनसे लिए हुए 5.30 करोड़ रुपए नहीं लौटा रहे हैं। अदनान ने उन्हें 5 फ्लैट दिए थे, लेकिन उनका कब्जा नहीं दे रहे हैं।' कौशिक ने कहा कि मामले की जांच जारी है।
पिछले महीने पत्नी द्वारा शिकायत दर्ज कराए जाने के बाद अदनान ने अदालत से अग्रिम जमानत मांगी थी। अदालत ने उनकी अर्जी मंजूर नहीं की थी क्योंकि उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई थी। इसके साथ ही कोर्ट ने पुलिस से कहा था कि अगर अदनान केखिलाफ शिकायत दर्ज होती है तो उन्हें 72 घंटे का नोटिस दिया जाए ताकि वह अदालत से अग्रिम जमानत ले सके।